निशांत कुमार के चेहरे पर जेडीयू लड़ेगी UP चुनाव, जानिए बीजेपी के लिए नफा या नुकसान
उत्तर प्रदेश के 2027 विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) यानी जेडीयू ने उतरने का मन बनाया है. जेडीयू ने इस बार अपने सियासी अभियान की कमान नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार को सौंपी है. नीतीश कुमार दो दशक से यूपी में अपनी सियासी जड़ें जमाने के तमाम जतन कर चुके हैं, लेकिन सफल नहीं रहे. ऐसे में अब निशांत यूपी के सियासी आंगन में क्या करिश्मा दिखा पाएंगे?
जेडीयू का पुराना चुनावी इतिहास भले ही यूपी में बहुत मजबूत न रहा हो, लेकिन चुनावी मैदान में उतरने के मुख्य निहितार्थ निकाले जा रहे हैं. बिहार की सीमा से सटे यूपी की सीटों पर जेडीयू ने चुनाव लड़ने का दांव चला है. ऐसे में सवाल उठता है कि जेडीयू का चुनावी रण में उतरना बीजेपी के लिए चिंता बढ़ाएगा या फिर सियासी तौर पर फायदा पहुंचाएगा.
हालांकि, 2015 का बिहार चुनाव जीतने के बाद नीतीश कुमार ऐसे ही वाराणसी से यूपी में सक्रिय हुए थे, लेकिन बाद में 2017 का चुनाव लड़ने से पीछे हट गए थे. अब फिर से नीतीश कुमार की पार्टी हाथ-पैर मारने लगी है. ऐसे में सवाल है कि कहीं यूपी में प्रेशर पॉलिटिक्स तो नहीं चल रही या फिर पार्टी वाकई चुनाव में उतरने के लिए गंभीर है.
यूपी में जेडीयू क्यों चुनाव लड़ना चाहती है?
उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल और मध्य यूपी के कई जिलों में कुर्मी (पटेल) समाज की आबादी अच्छी-खासी है, जो यादवों के बाद दूसरी बड़ी ओबीसी जाति है. यूपी में कुर्मी समाज काफी प्रभावशाली वोट माना जाता है. इसके साथ ही गैर-यादव अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और अति-पिछड़ा (EBC) समुदाय का भी बड़ा वोट बैंक है. जेडीयू इसी जातीय समानता के भरोसे यूपी के सियासी मैदान में अपने पैर जमाने की कोशिश कर रही है.
बिहार में कुर्मी समाज नीतीश कुमार का सबसे मजबूत कोर वोटबैंक रहा है. जेडीयू इसी सामाजिक समीकरण को साधते हुए यूपी में अपने लिए जगह तलाश रही है. इसी सियासी संभावना को भुनाने और अपने राजनीतिक आधार को बढ़ाने के लिए जेडीयू ने यूपी में चुनाव लड़ने का प्लान बनाया है. बिहार के बाहर अपनी राष्ट्रीय पार्टी की महत्वाकांक्षा को जिंदा रखने के लिए जेडीयू के लिए यूपी एक स्वाभाविक ज़मीन है.
सियासत में किसी भी क्षेत्रीय पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा पाने या अपना सियासी दायरा बढ़ाने के लिए अलग-अलग राज्यों में एक निश्चित वोट शेयर की जरूरत होती है. अब नीतीश कुमार अपनी पार्टी को सिर्फ बिहार तक सीमित न रखकर राष्ट्रीय फलक पर प्रासंगिक बनाए रखना चाहते हैं, जिसके लिए यूपी में चुनाव लड़ने का मन बनाया है. इसके लिए उन्होंने अपने बेटे निशांत कुमार को आगे कर यूपी चुनाव लड़ने की योजना बनाई है.
बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार की पार्टी एनडीए का अहम हिस्सा है. लेकिन जब कोई दल दूसरे राज्यों (जैसे यूपी) में भी अपने पैर पसारने की कोशिश करता है और अपनी मौजूदगी दर्ज कराता है, तो राष्ट्रीय स्तर पर और गठबंधन के भीतर उसका राजनीतिक वजन बढ़ जाता है.
यूपी में चुनाव लड़ने की तैयारी या सीटों की मांग करने से एनडीए के भीतर जेडीयू की सौदेबाजी की क्षमता (Bargaining Power) मजबूत होती है. निशांत कुमार ने कहा कि यूपी में हमारी इच्छा एनडीए के साथ चुनाव लड़ने की है, जिसके लिए हमारे शीर्ष नेतृत्व की बीजेपी के साथ बातचीत चल रही है. बीजेपी के साथ सीट शेयरिंग पर बात नहीं बनती है तो जेडीयू अलग चुनाव लड़ सकती है. 2022 में भी जेडीयू ने अलग चुनाव लड़ने का फैसला किया था.
जेडीयू ने यूपी चुनाव की पूरी कमान नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार को सौंपी है. इसे निशांत कुमार के सियासी पदार्पण और उनकी राष्ट्रीय स्तर पर लॉन्चिंग के रूप में देखा जा रहा है. पार्टी चाहती है कि निशांत को एक बड़े राज्य के चुनाव मैदान में उतारकर उनके नेतृत्व को आंका जाए और उन्हें पार्टी के नए चेहरे के रूप में स्थापित किया जाए.
यूपी में अगर जेडीयू अकेले चुनाव लड़ती है और कुर्मी या पिछड़ा वोट बैंक काटने में सफल रहती है, तो इससे एनडीए के पारंपरिक वोट बैंक में बिखराव हो सकता है, जिसका सीधा फायदा सपा को मिल सकता है. यूपी में जेडीयू की नजर जिस कुर्मी समुदाय पर है, वह फिलहाल बीजेपी का परंपरागत वोटर माना जाता है.
उत्तर प्रदेश में कुर्मी समाज का सबसे बड़ा एनडीए चेहरा फिलहाल अनुप्रिया पटेल (अपना दल-सोनेलाल) हैं. जेडीयू के यूपी मैदान में आने से कुर्मी नेतृत्व का दावेदार एक और दल खड़ा हो जाएगा, जिससे अपना दल (एस) के जनाधार में सेंध लग सकती है. अगर जेडीयू एनडीए के तहत यूपी में चुनाव लड़ने की अपनी मांग पर अड़ी रहती है, तो बीजेपी के सामने अपने पुराने और नए सहयोगियों के बीच सीटों का बंटवारा करना एक बड़ी चुनौती होगी.
बीजेपी के लिए यूपी में पहले से ही अपना दल (एस), निषाद पार्टी और सुभासपा (ओमप्रकाश राजभर) जैसे मजबूत सहयोगी मौजूद हैं. जेडीयू को साथ लेने पर बीजेपी को अपनी सीटों की संख्या कम करनी पड़ सकती है. अगर बीजेपी जेडीयू को सीटें नहीं देती और जेडीयू अकेले 20-30 सीटों पर उतरती है, तो वह एनडीए के ही वोटों में कटौती करेगी, जैसा 2012 और 2022 में देखा जा चुका है.
यूपी में कुर्मी वोटर किसी भी एक दल के साथ पूरी तरह से लामबंद नहीं है. 2024 के लोकसभा और 2022 के विधानसभा चुनाव का वोटिंग पैटर्न देखें तो कुर्मी समुदाय का वोट बीजेपी, अपना दल (एस), सपा और कांग्रेस के बीच बंटा है. इसका नतीजा है कि यूपी में कांग्रेस, सपा, अपना दल और बीजेपी चारों दलों से कुर्मी विधायक हैं. हालांकि, 2024 में कुर्मी समाज का बड़ा वोट बैंक सपा के साथ गया था. जेडीयू के चुनाव में उतरने से कुर्मी वोटों में और बिखराव हो सकता है.
क्या इतिहास बदलेगा निशांत कुमार का नेतृत्व?
उत्तर प्रदेश में जेडीयू का इतिहास बहुत उत्साहजनक नहीं रहा है. 2002 में समता पार्टी के दौर में 2 सीटें और 2007 में बीजेपी के साथ 1 सीट जीतने वाली जेडीयू 2012 और 2022 में अकेले चुनाव लड़कर एक भी सीट नहीं जीत सकी थी. 2022 में पार्टी का वोट शेयर मात्र 0.11 फीसदी रह गया था. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस राजनीतिक जमीन पर खुद नीतीश कुमार दो दशकों में अपनी पकड़ नहीं बना सके, वहां उनके बेटे निशांत कुमार कितनी सफलता हासिल कर पाएंगे?
यूपी में पूरी बाजी इस बात पर निर्भर करेगी कि बीजेपी उन्हें एनडीए का हिस्सा बनाती है या जेडीयू को एक बार फिर अकेले मैदान में उतरना पड़ता है. हालांकि, यूपी में जेडीयू के पास न तो कोई बड़ा स्थानीय कैडर बेस है और न ही बूथ स्तर पर मजबूत ढांचा, जिसके कारण 2012 और 2022 के चुनावों में पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली.
यूपी की सियासत में जेडीयू का आना केवल चुनाव जीतने की कवायद नहीं, बल्कि अपनी राष्ट्रीय राजनीतिक जमीन को विस्तृत करने, जातीय समीकरणों को भुनाने और अपने नए नेतृत्व (निशांत कुमार) को आगे बढ़ाने का एक रणनीतिक दांव है.


