अंग्रेजों के वक्त दिल्ली में कितने थे जमीन के भाव? एक एकड़ के बस इतने रुपये

Direct Source Verification: This story is aggregated from India Today (indiatoday.in). Full reporting rights and copyright belong to the primary publisher.
आज दिल्ली के लुटियंस जोन में जमीन खरीदने की सोचना भी दिन में सपने देखने जैसा है. यहां जमीन के एक छोटे से टुकड़े की कीमत भी करोड़ों में है. लेकिन, एक ऐसा भी समय था जब इस इलाके की जमीन की कीमत बस कुछ रुपये थी. यही वजह है कि अंग्रेजों ने यहां रहने वाले लोगों से औने- पौने दाम में जमी...

आज दिल्ली के लुटियंस जोन में जमीन खरीदने की सोचना भी दिन में सपने देखने जैसा है. यहां जमीन के एक छोटे से टुकड़े की कीमत भी करोड़ों में है. लेकिन, एक ऐसा भी समय था जब इस इलाके की जमीन की कीमत बस कुछ रुपये थी. यही वजह है कि अंग्रेजों ने यहां रहने वाले लोगों से औने- पौने दाम में जमीनें खरीद ली और दिल्ली को नई राजधानी बनाया. 

जब रायसीना हिल और लुटियंस जोन में नई राजधानी बसाई जा रही थी. तब अंग्रेज अधिकारियों ने यहां रहने वाले लोगों से काफी कम कीमत पर जमीनें खरीदी या फिर उन्हें अपना घर-बार छोड़कर जाने को मजबूर कर दिया. ऐसे में जानते हैं कि आज जहां राष्ट्रपति भवन, संसद, पीएमओ और बड़े- बड़े जितनी भी महत्वपूर्ण इमारतें खड़ी हैं. उन जमीनों को अंग्रेजों ने कितने में खरीदा था? 

1911 में ब्रिटिश सरकार ने भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली शिफ्ट करने का फैसला किया. 12 दिसंबर 1911 को यह घोषणा की गई कि दिल्ली में वायसराय के रहने के लिए नया घर बनाया जाएगा. अब से दिल्ली ही नया एडमिनिस्ट्रेटिव सेंटर होगा.

इस घोषणा के बाद दिल्ली में नई राजधानी को बसाने के लिए जगह चुनने की बारी आई. आखिर नए एडमिनिस्ट्रेशन के लिए दफ्तर, वायसराय और बड़े अधिकारियों के आवास, साथ- साथ अन्य सुविधाएं और एमिनिटीज सेंटर्स के लिए कौन सा इलाका ठीक रहेगा और वहां जमीनें कैसे मिल पाएंगी? इस सब कामों के लिए एक कमेटी बनाई गई.

इस कमेटी ने कई जगहों की जांच की. आखिर में भारत की नई राजधानी बनाने के लिए रायसीना हिल को चुना गया. यह एक पहाड़ी थी, जिस पर रायसीना गांव बसा हुआ था. इस वजह से इस इलाके को रायसीना हिल कहा गया. इसके अलावा मालचा गांव के लोगों की जमीन भी चिह्नित की गई. इसी मलचा गांव की जमीन पर आज चाणक्यपुरी का पूरा इलाका है. 

इस इलाके को रायसीना हिल क्यों कहते हैं? ब्रिटिश सरकार ने नई राजधानी बनाने के लिए रायसीना और मालचा गांवों की जमीन का अधिग्रहण कर लिया.  इस प्रक्रिया में स्थानीय परिवारों को वहां से हटाकर दूसरी जगह बसाया गया. जिस पहाड़ी पर रायसीना गांव स्थित था, उसका नाम रायसीना हिल पड़ गया.

बाद में इसी पहाड़ी पर वायसराय हाउस बनाया गया, जिसे आज हम राष्ट्रपति भवन के नाम से जानते हैं. इसके आसपास नॉर्थ ब्लॉक, साउथ ब्लॉक और दूसरे महत्वपूर्ण सरकारी भवन भी बने. इस तरह एक पुराने गांव के नाम ने भारत की सत्ता के सबसे महत्वपूर्ण केंद्र को अपनी पहचान दे दी.

खाली कराए गए इन दोनों गांवों को संवारने की जिम्मेदारी एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर  जैसे अंग्रेज टाउन प्लानर्स को मिली. इन्हीं इंग्लिश टाउन प्लानर्स ने आज की नई दिल्ली बनाई. इसके रास्तों पर वायसराय का महल, जिसे अब राष्ट्रपति भवन कहा जाता है, सर्कुलर पिलर पैलेस, जिसे पार्लियामेंट सेक्रेटेरिएट बिल्डिंग के नाम से जाना जाता है, हरी-भरी जगहें, पार्क और गार्डन बनाए गए. यही वजह है कि यह पूरा इलाका इनके प्लानर के नाम से यानी लुटियंस जोन के नाम से जाना जाता है.  

करीब 3800 एकड़ जमीन अंग्रेजों ने एक्वायर की थी इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 1911 में दिल्ली में नई राजधानी बसाने के लिए अंग्रेजी हुकूमत ने  मलचा गांव में 1792 एकड़ और रायसीना गांव के आसपास लगभग 2000 एकड़ जमीन 150 परिवारों से एक्वायर की थी मलचा में केवल 35 परिवारों ने मुआवज़ा स्वीकार किया, जबकि बाकी लोगों ने इसे लेने से इनकार कर दिया या जिस समय पैसे बांटे जा रहे थे, वे वहां मौजूद नहीं थे.

इन गांवों के लोगों को दूसरी जगह बसा दिया गया. आज भी रायसीना और मलचा गांव में अपनी जमीन होने का दावा करने वाले लोग इस मामले को लेकर कोर्ट में लड़ाई लड़ रहे हैं. कई बार लोगों ने सही मुआवजे की मांग की है. राष्ट्रपति भवन की जमीन पर दावा करने वाले ऐसे ही परिवार के एक शख्स जो भट्टा हाजीपुर की 'रायसीना कॉलोनी' में रहे हैं, उनका कहना है कि उन्हें कोई मुआवज़ा नहीं मिला.

हरियाणा के सोनीपत 'हरसाना मलचा' और गाजियाबाद के भट्टा हाजीपुर में रहने वाले कुछ परिवारों  ऐसी ही लड़ाई लड़ रहे हैं. इन लोगों ने सालों से कई दीवानी अदालतों में याचिकाएं दायर की.उनकी मांग है कि उनके पूर्वजों की जो कीमती ज़मीन थी, उसके बदले उन्हें उचित मुआवज़ा दिया जाए.

इनलोगों ने काफी पुराने कुछ दस्तावेजों को एक सदी से बड़ी सावधानी से सहेज कर रखा है. इनमें 16 दिसंबर 1912 का एक दस्तावेज भी है, जिसका शीर्षक है 'दिल्ली की नई राजधानी के लिए एक्वायर्ड जमीनें.इसमें उन 70 जमीन मालिकों का विवरण है जिन्होंने अपनी जमीनें दी थीं और साथ ही यह भी बताया गया है कि उनमें से कुछ को क्या मुआवज़ा मिला था.

अंग्रेजों ने इन जमीनों की दी थी बस इतनी कीमत इन लोगों ने उन अपीलों के रिकॉर्ड भी संभाल कर रखे हैं जो उन्होंने 1914, 1915 और 1916 में इन अधिग्रहणों के खिलाफ दायर की थीं. अपीलों में कहा गया है कि हमारे पूर्वजों ने उपजाऊ जमीन के लिए 2400 रुपये प्रति एकड़ और बंजर जमीन के लिए 1920 रुपये प्रति एकड़ की मांग की थी. लेकिन अंग्रेजों ने क्रमशः केवल 85 रुपये और 15 रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से मुआवज़ा दिया. साथ ही, केवल 35 परिवारों ने ही यह मुआवज़ा लिया.

इन लोगों का कहना है कि उस समय मालचा गांव में रहने वाले 189 ऐसे परिवारों को भी बिना किसी आर्थिक मदद के वहां से निकाल दिया गया, जिनके पास अपनी जमीन नहीं थी. आज इस इलाके में जमीन खरीदना दिन में सपने देखने जैसा है. क्योंकि, रायसीना हिल और लुटियंस की जमीन खरीद पाना आम लोगों के बस की बात ही नहीं है. संपन्न होने के बावजूद इस इलाके में जमीन खरीदना नामुमकिन है. 

Original Source
https://www.aajtak.in/information/story/lutyens-delhi-raisina-hill-land-acquisition-price-british-rule-1911-tstsd-dskc-2689701-2026-11-06?utm_source=rss
Visit India Today ↗
SHARE STORY:
𝕏 f in

Related Coverage in World