सरपंच चुनाव: शादी ने बदला गांव का चुनावी गणित, सिलाई मशीन चलाने वाली ने किया कमाल; दो गांवों के रोचक नतीजे
राजस्थान में पंचायत चुनाव के नतीजों के साथ कई दिलचस्प कहानियां भी सामने आ रही हैं. कहीं एक शादी ने गांव का चुनावी गणित बदल दिया तो कहीं सिलाई मशीन चलाने वाली महिला ने चुनाव मैदान में ऐसा कमाल किया कि करोड़ों की संपत्ति घोषित करने वाली प्रत्याशी को हार का सामना करना पड़ा. करौली जिले के गुडला गांव में राहुल गुर्जर की पत्नी नैना धानका को चुनाव लड़ाने के लिए गुर्जर और धानका समाज के लोग एक साथ आए. वहीं जालोर के भैंसवाड़ा में बीए-बीएड की पढ़ाई करने वाली शारदा राणा ने सरपंच का चुनाव जीत लिया. खास बात यह है कि शारदा का सपना कभी सरकारी टीचर बनने का था, लेकिन अब वह गांव की सरकार चलाएंगी.
दोनों गांवों की ये कहानियां इसलिए भी दिलचस्प हैं, क्योंकि चुनाव में जीत तक पहुंचने का रास्ता दोनों के लिए अलग-अलग रहा. एक जगह आरक्षण के बाद शादी का रिश्ता चुनावी समीकरण की वजह बना तो दूसरी जगह पढ़ाई और संघर्ष के बाद सिलाई का काम करने वाली महिला ने सरपंच की कुर्सी हासिल कर ली.
पहली कहानी करौली जिले की सादौली ग्राम पंचायत के गुडला गांव की है. यहां लंबे समय से गुर्जर समाज के लोग सरपंच बनते रहे हैं. इस बार पंचायत चुनाव में सरपंच की सीट अनुसूचित जनजाति यानी एसटी वर्ग के लिए आरक्षित हो गई. इसके साथ ही गांव में चुनाव का पुराना गणित बदल गया. अब सवाल था कि इस बार चुनाव किसे लड़ाया जाए? इसी बीच राहुल गुर्जर का नाम चर्चा में आया. राहुल की शादी नैना धानका से हुई है. नैना धानका समाज से आती हैं और एसटी वर्ग की हैं. ऐसे में गांव में बैठक हुई और नैना को चुनाव मैदान में उतारने पर सहमति बनी. इसके बाद गुर्जर और धानका समाज के लोग एक साथ चुनाव प्रचार में जुट गए. दोनों समाजों ने नैना के समर्थन में लोगों से संपर्क किया और चुनाव की तैयारी शुरू कर दी. इस तरह राहुल और नैना का वैवाहिक रिश्ता गांव के चुनावी समीकरण में अहम कड़ी बन गया.
गुडला गांव में सरपंच पद के लिए कुल 11 उम्मीदवार मैदान में थे. चुनाव परिणाम आया तो नैना धानका ने बड़े अंतर से जीत दर्ज की. उन्हें कुल 2107 वोट मिले, जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी हरिओम मीणा को सिर्फ 243 वोट हासिल हुए. नैना ने 1864 वोटों के अंतर से चुनाव जीत लिया. जीत के बाद गांव में जुलूस निकाला गया और समर्थकों ने खुशी मनाई. चुनाव के दौरान जिन दो समाजों के लोग उनके साथ खड़े हुए थे, उनकी एकजुटता नतीजों में भी दिखाई दी. अब नैना के सामने गांव के विकास की जिम्मेदारी है. जिस चुनाव में उन्होंने इतने बड़े अंतर से जीत हासिल की, अब उसी गांव के लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरना उनके लिए सबसे अहम होगा.
अब दूसरी कहानी जालोर जिले की भैंसवाड़ा ग्राम पंचायत की. यहां शारदा कुमारी राणा ने सरपंच का चुनाव जीतकर सबका ध्यान खींचा है. उनकी कहानी भी किसी दिलचस्प मोड़ से कम नहीं है. शारदा ने बीए और बीएड की पढ़ाई की थी. उनका सपना सरकारी स्कूल में शिक्षक बनने का था. इसके लिए उन्होंने तैयारी भी की, लेकिन तृतीय श्रेणी शिक्षक भर्ती निरस्त होने के कारण उनका यह सपना पूरा नहीं हो सका. इसके बाद उन्होंने सिलाई का काम शुरू कर दिया. घर-परिवार की जिम्मेदारियों के बीच उनका संघर्ष जारी रहा. फिर पंचायत चुनाव आया तो उन्होंने सरपंच पद के लिए चुनाव लड़ने का फैसला किया. चुनाव में उतरीं तो गांव के लोगों ने उन्हें अपना समर्थन दिया और नतीजा उनके पक्ष में रहा. अब जिस महिला का सपना कभी बच्चों को पढ़ाने का था, वह गांव के विकास और लोगों की समस्याओं को सुलझाने की जिम्मेदारी संभालेंगी.
भैंसवाड़ा ग्राम पंचायत में सरपंच की सीट सामान्य महिला वर्ग के लिए आरक्षित थी. चुनाव में कुल 13 महिलाओं ने नामांकन दाखिल किया था, लेकिन दो उम्मीदवारों के नाम वापस लेने के बाद 11 महिलाएं मैदान में रह गईं. इनमें पांच सामान्य वर्ग, पांच ओबीसी और एक एसटी वर्ग की उम्मीदवार शारदा कुमारी राणा थीं. 30 अक्टूबर को हुए मतदान में पंचायत के कुल 4159 मतदाताओं में से 2671 लोगों ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया. इनमें 107 वोट खारिज हो गए, जबकि 13 वोट नोटा के खाते में गए. इस तरह 2564 वैध वोटों में शारदा को 650 वोट मिले और उनकी निकटतम प्रतिद्वंद्वी उमाकुमारी को 461 वोट हासिल हुए. शारदा ने 189 वोटों से जीत दर्ज की. इस चुनाव में उमाकुमारी की चर्चा उनकी पारिवारिक राजनीतिक पृष्ठभूमि के साथ-साथ उनकी संपत्ति को लेकर भी रही. उमाकुमारी आहोर विधानसभा क्षेत्र से तीन बार विधायक रहे माधोसिंह के पौत्र शिवप्रताप सिंह की पत्नी हैं. उनके पति वर्ष 2015 में भैंसवाड़ा के सरपंच रह चुके हैं. उमाकुमारी के चुनावी शपथ पत्र में 6 करोड़ 56 लाख 34 हजार 596 रुपये की संपत्ति घोषित की गई थी. इसके बावजूद शारदा ने उन्हें चुनाव में हरा दिया.
शारदा की जीत के बाद उनके परिवार में खुशी का माहौल है. उनके पति अचलेश्वर राणा का कहना है कि गांव के लोगों ने जो भरोसा जताया है, उसे बनाए रखने की कोशिश करेंगे. सभी को साथ लेकर गांव के विकास के काम किए जाएंगे. वहीं करौली के गुडला गांव में नैना धानका की जीत की चर्चा है. यहां शादी के रिश्ते से शुरू हुआ चुनावी समीकरण दो समाजों के साथ आने तक पहुंचा और नैना ने बड़ी जीत हासिल की. दोनों महिलाओं के चुनाव लड़ने की वजह और जीत की कहानी अलग-अलग है. एक तरफ नैना के लिए गांव के दो समाज एक साथ आए तो दूसरी तरफ शारदा ने अपने संघर्ष और चुनावी मैदान में मेहनत के दम पर जीत हासिल की. अब दोनों को गांव की जिम्मेदारी मिली है. देखना होगा कि चुनाव में मिले इस भरोसे को वे गांव के विकास में किस तरह बदलती हैं.


