जुड़वां बच्चों 'जग्गा-कालिया' को अलग करने वाले देश के फेमस न्यूरोसर्जन का निधन, AIIMS भोपाल के प्रेसिडेंट थे डॉ. अशोक कुमार महापात्र
जुड़वां बच्चों 'जग्गा और कालिया' को अलग करने वाली सर्जरी का नेतृत्व करने वाले देश के प्रख्यात न्यूरोसर्जन पद्मश्री प्रोफेसर डॉ. अशोक कुमार महापात्र का निधन हो गया. उन्होंने 2 नवंबर को अंतिम सांस ली. वे एम्स भोपाल के अध्यक्ष और संस्थान सभा के सदस्य थे.
एम्स भोपाल के कार्यपालक निदेशक लेफ्टिनेंट जनरल (डॉ.) नरेंद्र कोतवाल (रिटायर्ड) ने उनके निधन पर गहरा दुख जताया है. उन्होंने इसे संस्थान और देश की चिकित्सा बिरादरी के लिए अपूरणीय क्षति बताया. साथ ही दिवंगत आत्मा की शांति और शोक संतप्त परिवार को इस दुख को सहने की शक्ति देने की प्रार्थना की.
डॉ. अशोक कुमार महापात्र को वर्ष 2017 में की गई एक जटिल सर्जरी के लिए खास तौर पर याद किया जाता है. उन्होंने एम्स नई दिल्ली में ओडिशा के जुड़े हुए जुड़वां बच्चों जग्गा और कालिया को अलग करने वाली सर्जरी का नेतृत्व किया था.
करीब 16 घंटे तक चले इस ऑपरेशन में 30 डॉक्टरों की टीम शामिल थी. यह सर्जरी भारत के चिकित्सा इतिहास की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिनी जाती है और लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में भी दर्ज हुई.
ओडिशा के मूल निवासी डॉ. महापात्र का जन्म 29 दिसंबर 1952 को हुआ था. उन्होंने एम्स नई दिल्ली में स्नातकोत्तर प्रशिक्षण लिया. उनके पास एमएस (सर्जरी), एमसीएच (न्यूरोसर्जरी) और डीएनबी (न्यूरोसर्जरी) की डिग्रियां थीं.
उन्होंने एम्स नई दिल्ली में न्यूरोसर्जरी विभाग के अध्यक्ष, न्यूरोसाइंसेस सेंटर के प्रमुख और अनुसंधान डीन जैसे अहम पदों को संभाला. इसके बाद वे एम्स भुवनेश्वर के डायरेक्टर बने. उन्होंने SGPGIMS, लखनऊ के डायरेक्टर और शिक्षा व अनुसंधान (SOA) विश्वविद्यालय, भुवनेश्वर के कुलपति के रूप में भी जिम्मेदारी निभाई.
न्यूरोसर्जरी के क्षेत्र में डॉ. महापात्र का योगदान व्यापक रहा. उन्होंने सिर की चोट, स्कल-बेस सर्जरी, ग्रामीण मस्तिष्क सर्जरी, मिर्गी की सर्जरी और ब्रेन ट्यूमर जैसे क्षेत्रों में काम किया.
उनके नाम 870 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित करने का रिकॉर्ड है. डॉ. महापात्र ने 16 पुस्तकें लिखीं और 140 से अधिक पुस्तकों में अध्यायों का योगदान दिया. उनके शोध कार्य को 13,500 से अधिक उद्धरण मिले. उन्होंने 12 पीएचडी शोधार्थियों का मार्गदर्शन किया और 20 से अधिक शोध परियोजनाओं का संचालन किया.
चिकित्सा, शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें अप्रैल 2025 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने पद्मश्री से सम्मानित किया था. वर्ष 2022 में उन्हें ओडिशा विज्ञान अकादमी का सीवी रमन पुरस्कार भी मिला था.
