AI ले डूबा! अमेरिका-चीन में हाहाकार, कंपनियों के दांव पर खरबों डॉलर, अब क्या होगा?
'दुनिया बदल जाएगी, नई क्रांति आएगी, AI सबकुछ बदल कर रख देगा'. चंद महीने पहले AI को लेकर जो सपने देखे जा रहे थे. वो अब सच होता नहीं दिख रहा है. AI पर दांव लगाने वाली बड़ी-बड़ी से कंपनियां पस्त पड़ती जा रही हैं. किसी एक देश की ये कहानी नहीं है, जिसने AI पर जितना ज्यादा फोकस किया, अब उस देश को उतना बड़ा आर्थिक नुकसान हो रहा है.
दरअसल, एआई का बुलबुला अब फटने की कगार पर खड़ा है. इससे दुनिया के चुनिंदा टेक-सुपरपावर देशों से लेकर तकनीकी और वित्तीय रूप से AI पर निर्भर देशों को तगड़ा झटका लगने वाला है, इसका आगाज भी हो गया है. अंजाम क्या होगा किसी को पता नहीं है? लेकिन AI को लेकर मौजूदा माहौल डराने वाला है. क्योंकि जो देश AI में लीडर हैं, उन्हें तगड़े आर्थिक झटके लगे हैं. हालांकि जो देश AI की दौड़ में थोड़े पीछे थे, उनपर संकट भी कम है.
ऐसा अचानक क्यों हुआ? क्या एआई की ऐसी इमारत थी, जो अब अपने ही बोझ तले ढहने की कगार पर पहुंच चुकी है? क्योंकि AI की माौजूदा स्थिति ने पूरी दुनिया की कल्पनाओं को झकझोर कर रख दिया था. कहां दावा किया जा रहा था कि एआई मानव इतिहास की सबसे बड़ी तकनीकी क्रांति लेकर आएगा, जो न सिर्फ उद्योगों की सूरत बदल देगी बल्कि इंसानी जीवन को पूरी तरह से आसान और हाईटेक बना देगी. इसी उम्मीद में दुनिया भर की बड़ी तकनीकी कंपनियों और निवेशकों ने बिना कोई रिस्क के खरबों डॉलर झोंक दिए.
लेकिन आज, यह चमकता हुआ सपना धुंधलाता नजर आ रहा है. हालात ये हैं कि एआई के इस अंधी दौड़ में शामिल टेक दिग्गज अब पस्त और दबाव में दिखाई देने लगे हैं. सबसे बड़ा संकट इस बात का है कि भारी-भरकम निवेश के बावजूद अभी तक एआई से मुनाफे का कोई ठोस और टिकाऊ रोडमैप तैयार नहीं हो पाया है. जिन भारी-भरकम लागतों से मॉडल तैयार किए जा रहे हैं, उस अनुपात में बाजार से रिटर्न न मिलने के कारण निवेशकों का भरोसा डगमगाने लगा है. और इसका असर दुनिया के बाजारों पर देखने को मिल रहे हैं.
यही नहीं, IMF और विश्व बैंक भी अब नुकसान का आकलन करने लगा है. किस देश को अधिक आर्थिक चोट पहुंचने वाली है. इसके अलावा तमाम एक्सपर्ट्स भी AI को लेकर धुंधली तस्वीर पेश कर रहे हैं. कहा जा रहा है कि इसका सबसे बड़ा आर्थिक नुकसान भी अमेरिका को ही उठाना पड़ेगा. क्योंकि वैश्विक एआई क्रांति का केंद्र अमेरिका है. माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, ओपनएआई, एनवीडिया और मेटा जैसी दिग्गज कंपनियां AI पर सबसे ज्यादा फोकस कर रही हैं. अब सबसे ज्यादा कोहराम भी अमेरिकी शेयर बाजार में ही मचा है.
एआई स्टॉक्स वाले इंडेक्स नैस्डैक-100 में गुरुवार को मार्च-2020 के बाद एक दिन में 6 फीसदी की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई. खासकर अमेरिकी एआई कंपनियों के शेयरों में भूचाल देखने को मिल रहे हैं. झटके में 25 फीसदी तक शेयर गिर रहे हैं. गुरुवार को अमेरिकी शेयर बाजार में 2.5 ट्रिलियन डॉलर स्वाहा हो गया. इनमें से करीब 1 ट्रिलियन डॉलर तो केवल एआई स्टॉक्स वाली कंपनियों के डूबे.
दरअसल अमेरिका ने एआई इन्फ्रास्ट्रक्चर, डेटा सेंटर और चिप बनाने में खरबों डॉलर का निवेश किया है. अगर एआई उम्मीद के मुताबिक मुनाफा नहीं दे पाता या फ्लॉप होता है, तो अमेरिकी शेयर बाजार पर गहरा असर पड़ेगा. इससे सीधे तौर पर निवेशकों, बैंकों और अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लगेगा.
AI में निवेश को लेकर अमेरिका को चीन टक्कर दे रहा था. चीन ने एआई हार्डवेयर, सेमीकंडक्टर और डेटा सेंटर्स के निर्माण में बहुत बड़ा आर्थिक दांव खेला है. यही नहीं, चीन के शेयर बाजारों और तकनीकी स्टार्टअप्स में एआई को लेकर भारी निवेश हुआ है. अगर यह तकनीक बैठती है या मंदी आती है, तो चीन के वित्तीय बाजारों और औद्योगिक विकास पर इसका गंभीर असर पड़ेगा. पिछले कुछ दिनों से चीन के शेयर बाजारों में भी गिरावट का माहौल है.
ताइवान और दक्षिण कोरिया ग्लोबल सेमीकंडक्टर यानी चिप सप्लाई चेन के मुख्य केंद्र हैं. एनवीडिया और अन्य कंपनियों के लिए एडवांस एआई चिप्स का उत्पादन मुख्य रूप से ताइवान (TSMC) और दक्षिण कोरिया में होता है. एआई की मांग अचानक घटने से इन देशों से शेयरों बाजार में AI स्टॉक्स में भारी बिकवाली देखने को मिल रही है. गुरुवार का दक्षिण कोरिया में भारी बिकवाली की वजह से 20 मिनट तक ट्रेडिंग रोकनी पड़ी. यानी AI के फेल होने से इन देशों के चिप निर्माताओं के शेयरों और निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा.
क्योंकि दक्षिण कोरिया की अर्थव्यवस्था बहुत हद तक टेक्नोलॉजी और खासकर चिप निर्माण पर टिकी है. एआई मॉडल को प्रशिक्षित करने और चलाने के लिए उच्च क्षमता वाले एडवांस सेमीकंडक्टर और HBM चिप्स की आवश्यकता होती है. दक्षिण कोरियाई कंपनियां जैसे सैमसंग और SK हाइनिक्स ने एआई की इस भारी मांग को पूरा करने के लिए अपने प्रोडक्शन और इन्फ्रास्ट्रक्चर में खरबों वॉन का निवेश किया है.
अगर एआई तकनीक का यह दौर उम्मीद के मुताबिक मुनाफा नहीं दे पाता है या मांग अचानक गिर जाती है, तो इन चिप निर्माताओं के शेयरों में भारी गिरावट आएगी. दक्षिण कोरिया का कुल निर्यात और शेयर बाजार काफी हद तक टेक सेक्टर पर निर्भर है, इसलिए एआई का बुलबुला फूटना वहां की पूरी अर्थव्यवस्था को मंदी में धकेल सकता है.
जापान अपनी घटती हुई आबादी और बढ़ती बुजुर्गों की संख्या जैसी समस्या से निपटने के लिए एआई और रोबोटिक्स को सबसे बड़ा समाधान माना है. जापान में मैन्युफैक्चरिंग, हेल्थकेयर और सर्विस सेक्टर में एआई और ऑटोमेशन पर अंधाधुंध पैसा लगाया जा रहा है. जापानी कंपनियां जैसे सॉफ्टबैंक एआई स्टार्टअप्स में भारी निवेश करने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में शामिल हैं. अब अगर AI प्रोजेक्ट्स उम्मीद के मुताबिक रिजल्ट देने में असफल होते हैं या वित्तीय रूप से टिकाऊ साबित नहीं होते, तो सॉफ्टबैंक जैसे निवेशकों को भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ेगा.
भारत और फिलीपींस जैसे विकासशील देश सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट, आईटी सर्विसेज और बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग (BPO) के बड़े केंद्र हैं. ऐसे में अगर एआई टेक्नोलॉजी को लेकर फैसले पलटता है, तो इन देशों के सर्विस सेक्टर और जॉब मार्केट पर तात्कालिक उथल-पुथल आ सकती है, जो ग्लोबल डिजिटल लेबर मार्केट पर निर्भर हैं. वहीं यूके, जर्मनी और फ्रांस एआई के रेगुलेशन में आगे हैं. लेकिन टेक्नोलॉजी प्रोडक्शन के मामले में अमेरिकी और चीनी कंपनियों पर काफी हद तक निर्भर है.
AI के फ्लॉप होने के क्या कारण हैं? इंडस्ट्रीज एक्सपर्ट्स बताते हैं कि एआई सेक्टर में हो रहे भारी-भरकम निवेश और इसके रिटर्न को लेकर वैश्विक स्तर पर चिंताएं बढ़ रही हैं. क्योंकि इससे प्रॉफिट का कोई रोडमैप साफ नहीं है, कई बड़ी कंपनियां कर्ज लेकर AI पर निवेश कर चुकी हैं. अगर AI से रेवेन्यू जेनेरेट नहीं होता है तो फिर कंपनियां आर्थिक संकट में घिर सकती हैं. इसलिए अब पूरी दुनिया में AI कंपनियों के शेयर में भारी बिकवाली देखने को मिल रही है.
