'अरब पार्टियों' ने किया नेतन्याहू की नाक में दम, 19 सीटें जीतने वाले ये दल यहूदी इजरायल में कैसे पनपे?

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वे इजरायल में रहने वाले अरबी हैं. उनकी नागरिकता इजरायल की है, लेकिन उनकी पहचान अरब की है. अपनी पहचान के बिना वे कतई नहीं जीना चाहते हैं. इसलिए आम तौर पर चुनाव का बहिष्कार करने वाले इजरायली अरबों ने इस रणनीति बदल ली और ये बदली हुई रणनीति   प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सत्ता ...

वे इजरायल में रहने वाले अरबी हैं. उनकी नागरिकता इजरायल की है, लेकिन उनकी पहचान अरब की है. अपनी पहचान के बिना वे कतई नहीं जीना चाहते हैं. इसलिए आम तौर पर चुनाव का बहिष्कार करने वाले इजरायली अरबों ने इस रणनीति बदल ली और ये बदली हुई रणनीति   प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सत्ता में वापसी की राह में रोड़ा बन गई. इजरायली अरबों ने इस बार पिछली सारी दुश्वारियों को भूलाकर इस बार 'थोक' में मतदान किया. और इसका नतीजा सामने है. इजरायल की अरब पार्टियां इस चुनाव में 120 सीटों में 19 सीटें जीतकर किंगमेकर बन गई हैं. 

इजरायल की राजनीति में हुए इस फेरबदल ने प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सत्ता में वापसी का रास्ता मुश्किल कर दिया है. मंगलवार रात को एक वेडिंग हॉल में एग्जिट पोल देख रहे समर्थकों की नारेबाजी के बीच राआम (Ra'am) पार्टी के नेता मंसूर अब्बास ने घोषणा की, "हम यहां हैं और हम हाशिये पर नहीं बैठे हैं."

अरब इजरायली जिन्हें अक्सर वहां की राजनीति में हाशिये पर माना जाता है. कई बार जिनकी वफादारी पर सवाल उठाए जाते हैं, जिनकी पहचान को लेकर राजनीतिक बहस होती है और जिन्हें नेतन्याहू की दक्षिणपंथी राजनीति में निशाना बनाया जाता रहा है, उन्हीं अरबों की राजनीतिक ताकत इस बार इतनी बढ़ गई कि वे सरकार बनाने और गिराने की स्थिति में पहुंच गए.

27 अक्टूबर 2026 को हुए इजरायल के संसदीय चुनाव में अरब नेतृत्व वाली दो पार्टियों ने मिलकर 19 सीटें जीत लीं. जबकि पिछले चुनाव में ये आंकड़ा 15 का था. यह इनका अब तक का सबसे बड़ा चुनावी प्रदर्शन है. 120 सदस्यों वाली इजरायली संसद यानी नेसेट में सरकार बनाने के लिए 61 सीटों की जरूरत होती है. लेकिन नेतन्याहू का गठबंधन 53 सीटों पर सिमट गया, जबकि गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी खेमे को 48 सीटें मिलीं. 

अब अरब पार्टियों का झुकाव जिस ओर होगा इजरायल का प्रधानमंत्री वही बनेगा. पीएम नेतन्याहू की पार्टी तो इन अरब पार्टियों की वैचारिक दुश्मन है. इस चुनाव में नेतन्याहू ने इन पार्टियों पर वोट चोरी का आरोप लगाया है. लेकिन जियॉनिस्ट राष्ट्रवाद पर चल रहीं इजरायल की विपक्षी पार्टियों के लिए भी इन पार्टियों का समर्थन लेना मुश्किल होगा, क्योंकि इन मांगें इजरायली राष्ट्रवाद की धारणा से टकराती हैं. इसके अलावा इजरायल का विपक्ष भी अब तक उनसे समर्थन लेने से इनकार करता रहा है. 

इजरायल के चुनाव ऑफिस के अनुसार पिछले मंगलवार को 8 लाख से अधिक लोगों ने 'राआम' (Ra’am) और 'जॉइंट लिस्ट' के लिए वोट किया. यह तीन अरब-नेतृत्व वाली पार्टियों का एक गठबंधन है. 2022 के पिछले चुनावों की तुलना में इसमें 60% से अधिक की वृद्धि हुई है. 

इजरायल के नेगेव रेगिस्तान से लेकर उत्तरी गैलिली तक अरब समुदायों के मतदान केंद्रों पर मतदाता देखने को मिले. नेगेव के एक बेदौइन गांव, ताराबिन में, नेतन्याहू की पार्टी ने पिछले दो चुनावों में बहुमत हासिल किया था. लेकिन मंगलवार को यहां मतदान लगभग दोगुना हो गया और 'राआम' को 93% वोट मिले.

एपी की रिपोर्ट के अनुसार उत्तरी शहर सखनिन में इजरायल का सबसे अधिक 87% मतदान दर्ज किया गया. मेयर माजेन घनैम ने कहा कि मतदाताओं ने इसे अरब समुदायों में बढ़ते हिंसक अपराधों और नेतन्याहू के कट्टर दक्षिणपंथी सहयोगियों द्वारा भड़काऊ गतिविधियों से निपटने के लिए एक आपातकालीन कदम के रूप में देखा. 

'राआम' के समर्थक घनैम ने हाल ही में अरब-विरोधी हिंसा की घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा, "मैं अपने क्षेत्र के लोगों को मारे जाने से बचाना चाहता हूं, अपने बच्चों को विश्वविद्यालयों में हमलों से बचाना चाहता हूं, और अस्पतालों में अरब डॉक्टरों पर होने वाले हमलों को रोकना चाहता हूं."

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि ये अरब कोई बाहरी समुदाय नहीं हैं, जो किसी दूसरे देश से आकर इजरायल की राजनीति में दखल दे रहे हैं. ये इजरायल के ही नागरिक हैं. इन्हें फिलीस्तीनी मूल के इजरायली नागरिक या अरब-इजरायली कहा जाता है. इजरायल की कुल आबादी में इनकी हिस्सेदारी करीब 21 फीसदी है. इनके परिवारों का बड़ा हिस्सा 1948 में इजरायल के गठन के समय और उसके बाद की घटनाओं के दौरान इसी इलाके में रह गया था. ये इजरायली नागरिक हैं, इनके पास वोट देने का अधिकार है और ये संसद में अपने प्रतिनिधि चुनते हैं. हालांकि, नागरिकता मिलने के बावजूद इन्हें सामाजिक और आर्थिक भेदभाव, जमीन, रोजगार, शिक्षा और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर लंबे समय से संघर्ष करना पड़ा है. 

इस बार 19 सीटें दो अलग-अलग राजनीतिक धड़ों को मिली हैं. पहला है जॉइंट लिस्ट. जिसे यूसुफ जबरीन के नेतृत्व में चुनावी सफलता मिली है. इस गठबंधन को 11 सीटें मिली हैं. इसमें तीन पार्टियां शामिल हैं- हदाश, ताआल और बलाद. हदाश वामपंथी विचारधारा वाली पार्टी है, जिसकी जड़ें इजरायल के कम्युनिस्ट आंदोलन में हैं. यह अरब और यहूदी दोनों समुदायों के लोगों को साथ लेकर चलती है. ताआल अरब राष्ट्रवादी विचारधारा रखती है, जबकि बलाद फिलिस्तीनी राष्ट्रीय पहचान, समान नागरिक अधिकारों और इजरायल की मौजूदा यहूदी राष्ट्र-राज्य की अवधारणा की आलोचना के लिए जानी जाती है.

दूसरी पार्टी है राआम (Ra'am) यानी यूनाइटेड अरब लिस्ट. इसे मंसूर अब्बास चलाते हैं और इस बार इसे 8 सीटें मिली हैं. इसका संबंध इजरायल में सक्रिय इस्लामिक मूवमेंट की दक्षिणी शाखा से है. लेकिन इसकी राजनीति जॉइंट लिस्ट से अलग है. राआम का जोर फिलिस्तीन के सवाल के साथ-साथ इजरायल के भीतर अरब नागरिकों की रोजमर्रा की समस्याओं पर है. मसलन अरब बहुल इलाकों में अपराध, पुलिस व्यवस्था, शिक्षा, रोजगार, आवास और विकास के लिए सरकारी बजट.

मंसूर अब्बास की राजनीति की खास बात यह है कि वह इजरायल की मौजूदा व्यवस्था के भीतर रहकर अरब समुदाय के लिए राजनीतिक हिस्सेदारी और सुविधाएं हासिल करने की वकालत करते हैं. 

इजरायल में अरबी पहचान रखने वाले नागरिकों की स्थिति बेहद जटिल है. उनके पास इजरायली नागरिकता है. वे चुनाव लड़ सकते हैं, वोट दे सकते हैं, संसद में पहुंच सकते हैं और अदालतों का दरवाजा खटखटा सकते हैं. अरब समुदाय के लोग डॉक्टर, वकील, शिक्षक, कारोबारी और सरकारी कर्मचारी भी हैं. लेकिन नागरिकता के बावजूद उनकी राष्ट्रीय पहचान और बराबरी के अधिकारों को लेकर विवाद बना रहता है.

इसका एक बड़ा उदाहरण 2018 का नेशन स्टेट कानून है. इस कानून ने इजरायल को यहूदी लोगों का राष्ट्र-राज्य घोषित किया और राष्ट्रीय आत्मनिर्णय के अधिकार को यहूदियों तक सीमित कर दिया. अरब नागरिकों का सवाल है कि अगर वे भी इजरायल के नागरिक हैं, टैक्स देते हैं, चुनाव लड़ते हैं और संसद में प्रतिनिधि भेजते हैं, तो फिर अपने ही देश में राष्ट्रीय पहचान और आत्मनिर्णय के अधिकार में वे बराबर के हिस्सेदार क्यों नहीं हैं? 

इसके अलावा अरब बहुल कस्बों में संगठित अपराध, गोलीबारी, पुलिस की कार्रवाई, आवास और विकास की कमी जैसी समस्याएं भी लंबे समय से बनी हुई हैं. 

अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक अरब समुदाय के करीब 80 फीसदी योग्य् मतदाताओं ने वोट डाला. गाजा युद्ध, नेतन्याहू सरकार की नीतियों, दक्षिणपंथी मंत्रियों की बयानबाजी और अरब इलाकों में बढ़ते अपराध ने लोगों को मतदान केंद्रों तक पहुंचाया. पहले अरब मतदाता यहूदी पार्टियों को भी वोट देते थे. 1980 और 1990 के दशक में करीब आधे अरब मतदाता यहूदी पार्टियों के पक्ष में मतदान करते थे. लेकिन अब इजरायल के अरब मतदाताओं में 85 से 90 फीसदी अपनी ही अरब पार्टियों को वोट देते हैं. 

दरअसल 19 सीटें जीतने के बावजूद अरब पार्टियों के लिए सरकार में शामिल होना आसान नहीं है. नेतन्याहू ने इन पार्टियों पर आतंकवाद का समर्थन करने और चुनाव में धांधली कराने जैसे आरोप लगाए हैं. इसलिए इसके बहुत कम चांस हैं कि नेतन्याहू की पार्टी लिकुड इनके साथ समझौता करेगी.

दूसरी तरफ विपक्ष के कई बड़े नेता भी अरब पार्टियों के साथ सरकार बनाने को तैयार नहीं दिख रहे. नफ्ताली बेनेट और यायर लैपिड ने इनके साथ सरकार में बैठने से इनकार किया है. अविग्दोर लिबरमैन भी इनके समर्थन पर निर्भर सरकार बनाने के खिलाफ हैं. हालांकि वामपंथी डेमोक्रेट्स पार्टी के नेता यायर गोलान अरब पार्टियों के साथ सहयोग के पक्ष में हैं.

दिलचस्प यह है कि 2021 में मंसूर अब्बास की राआम पार्टी ने नफ्ताली बेनेट और यायर लैपिड की सरकार को समर्थन दिया था. वह इजरायल के इतिहास में पहली बार था, जब किसी स्वतंत्र अरब पार्टी ने सरकार में शामिल होकर सत्ता का हिस्सा बनने का फैसला किया था. उस समय राआम ने अपने समर्थन के बदले अरब समुदाय के लिए विकास बजट और क्राइम कंट्रोल का वादा लिया था. 

फिलहाल एक बात साफ है. इजरायल में जिन्हें लंबे समय तक राजनीतिक हाशिये पर रखा गया, वही अरब नागरिक अब सत्ता की चाबी अपने हाथ में लेकर खड़े हैं.  

Original Source
https://www.aajtak.in/world/story/israel-election-arab-new-govt-benjamin-netanyahu-ram-joint-list-party-zionist-regime-ntcppl-dskc-2684431-2026-10-30?utm_source=rss
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